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84 कोसीय परिक्रमा

March 1, 2025 @ 7:00 am - March 13, 2025 @ 4:00 pm

महर्षि दधीचि द्वारा लोक कल्याण हेतु अस्थि दान एवं नैमिषारण्य की 84 कोसीय परिक्रमा का फल

महर्षि दधीचि एक परोपकारी ऋषि थे और सदा वह ब्रह्म गान गाते रहते थे उनके गान को सुनकर असुर भी देवता बन जाते थे और अतिथि सेवा उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था । एक समय की बात है सभी ऋषि मुनि एवं देववृंद असुर राज वृत्रासुर के अत्याचारों से पीड़ित होकर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना करते हुए कहा- हे पितामह ! वृत्रासुर हमें तपस्या नही करने दे रहा, जब हम जप-तप एवं यज्ञादि करते हैं तो वह हमारे यज्ञ में विघ्न करके यज्ञ को विध्वंस कर देता है। अतः आप हमारी रक्षा कीजिये ।

तब ब्रह्मा जी ने कहा-हे देववृंद ! आप सब महर्षि दधीचि के द्वार जाकर, देवताओं के द्वारा प्रदत्त दिव्य बाणों को प्राप्त कर वृत्रासुर का वध करो। सभी देववृंदों ने महर्षि दधीचि के द्वार जाकर ब्रह्मा जी का सन्देश दिया, जिसे सुनकर महर्षि दधीचि ने कहा कि हे देवताओं ! उन दिव्य बाणों को हमने भांग के साथ जल में घोट-घोंट कर पीलिया है। अब वह दिव्य बाण प्रत्यक्ष रूप से देने में हम असमर्थ है तब देवराज इन्द्र ने महर्षि दधीचि से कहा- महर्षि ! समस्त दिव्य बाणों की शक्तियां आपकी अस्थियों में समा गई हैं, अतः आप देवकार्य सिद्ध करने के लिए लोक कल्याण हेतु अपनी अस्थियां दान स्वरूप हमें प्रदान कीजिये ।

यह सुनकर दधीचि का मुख मण्डल प्रसन्नता के मारे खिल उठा और उन्होने कहा कि- मानव शरीर बड़े भाग्य से प्राप्त होता है हमारी इच्छा यह है देवराज ! कि हम अस्थि दान करने से पूर्व समस्त तीर्थो में स्नान, समस्त देव दर्शन और समस्त संतों की परिक्रमा व सेवा करके देह त्याग करना चाहते हैं । अतः हे देवराज ! आप समस्त देवताओं तीर्थो के अधिराज होने के कारण सभी का नैमिषारण्य में आवाहन करो, यह सुनकर देवराज इन्द्र ने सभी देवताओं ऋषियों व तीर्थो का नैमिषारण्य में आवाहन किया और सभी आवाहित देवताओं, तीर्थो व ऋषिगणों ने 84 कोश के विविध स्थानों में अपना-अपना आसन गृहण किया।

उसके पश्चात् महर्षि दधीचि ने सभी देवताओं का आभार व्यक्त करते हुए सर्वप्रथम नैमिषारण्य क्षेत्र में 84 कोस की भूमि में स्थित समस्त देवताओं, तीर्थो व ऋषिगणों की 84 कोसीय एक परिक्रमा करके सभी तीर्थों के दर्शन, वंदन एवं अर्चना की, उसके बाद सभी तीर्थो व देवताओं ने दिव्य मंत्रोच्चार करते हुए महर्षि दधीचि को सभी तीर्थो, नदियों व समुद्रों के दिव्य जलों से स्नान कराया, उसके पश्चात् महर्षि दधीचि ने सभी देवताओं को वंदन एवं धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपने वचनों के अनुसार शरीर में दही और नमक का लेप लगाकर अपनी देह को गायों से चटवाते हुए फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष एकादशी की पवित्र तिथि में प्रातः कालीन बेला में लोक कल्याण हेतु अपनी अस्थियों का दान कर देह त्याग कर दिया ।

उसके पश्चात विश्वकर्मा त्वष्टा ने महर्षि दधीचि की अस्थियों से वज्र का निर्माण किया और उसी वज्र के द्वारा देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया। पुराणों के अनुसार समस्त तीर्थो का जल एक ही स्थान व तीर्थ में डालकर मिश्रित किया गया था। वह स्थान वर्तमान काल में दधीचि कुण्ड (मिश्रिकावन) मिश्रिख के नाम से जाना जाता है। यहीं पर महर्षि दधीचि ने समस्त तीर्थो के जल में स्नान कर अस्थि दान दिया था | ब्रम्ह पुराण के आधार पर अस्थि दान के समय उनकी धर्म पत्नी उपस्थित नहीं थी । उन्होंने सारा समाचार जानकर देवताओं को जड़ योनि प्राप्त करने का शाप दे दिया था। जिसके कारण सभी देवता महर्षि दधीचि की पत्नी का मान रखते हुए नैमिषारण्य में वृक्ष योनि को प्राप्त हो गये। उस काल से लेकर वर्तमान के काल तक सभी देवता वृक्ष का रूप लेकर आनन्द पूर्वक नैमिषारण्य में नित्य वास करते हैं।

आज भी जो प्राणी नैमिषारण्य में देवताओं के प्रिय आम के वृक्षों का दान करता है। उस प्राणी के वंश का कभी विनाश नहीं होता और अंततः वह प्राणी शरीर त्यागने के पश्चात् देव योनि को प्राप्त होता है । सामान्य समय में नैमिषारण्य में किया गया पुण्य, दान, तप एवं यज्ञादि चार गुना अधिक फल प्राप्त होता है, वही फल फाल्गुन मास में सहस्त्र गुना अधिक होकर दानदाता को प्राप्त होता है । अतः आज भी लाखों की संख्या में साधु-सन्त, ऋषि-मुनि, गृहस्थ श्रद्धालु, नागासाधु, तीर्थो की यात्रा के साथ-साथ वृक्षों की परिक्रमा करके उन्हीं वृक्षों के नीचे भोजन, भजन एवं श्यन करते हुए देवताओं की छत्रछाया में जीवन को धन्य करते हैं।

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    Details

    Start:
    March 1, 2025 @ 7:00 am
    End:
    March 13, 2025 @ 4:00 pm
    Event Category:

    Venue

    Shri ved vyas dham
    Naimisharanya
    Sitapur, Uttar Pradesh 261402 India
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