श्री वेदव्यास धाम

सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम्।

श्री वेदव्यास धाम आदि गंगा गोमती नदी के पूर्वीतट के अरण्य के बीचो बीच बेहद रमणीय स्थान है। चारो ओर प्राकृतिक सौन्दर्य और चित्त को असीम शांति देने वाला वातावरण मनमोह लेता है। “श्री वेदव्यास धाम” की स्थापना श्री व्यास पीठाधीश अनिल कुमार शास्त्री जी एवम उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सरोज देवी द्वारा 2007 में 88 हजार श्रीमद् भागवत पारायण महायाग के साथ की गई। वास्तव में देखें तो श्री वेदव्यास धाम का इतिहास द्वापर युगीन है, किसी समय यहीं महर्षि शौनक जी का आश्रम हुआ करता था। यहीं भगवान वेदव्यास और शौनक जी का संवाद भी हुआ था।

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आश्रम

श्री वेदव्यास धाम आदि गंगा गोमती नदी के पूर्वीतट के अरण्य के बीचो बीच बेहद रमणीय स्थान है।
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उद्देश्य

महा उपनिषद एवम कई ग्रन्थों में उद्धृत "वसुधैव कुटुंबकम "
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दान

दान सदैव सुपात्र: वक्ता दशसहस्त्रेषु दाता भवति वा न वा।

सत्येनोत्पद्यते धर्मो दयादानेन वर्धते। क्षमायां स्थाप्यते धर्मो क्रोधलोभा द्विनश्यति।।

दान सदैव सुपात्र: वक्ता दशसहस्त्रेषु दाता भवति वा न वा।

समय को अपने बचपन में ले जाइए तो आप पाएंगे हर त्योहार या नहान पर सुबह स्नान आदि कर अन्न और द्रव्य का दान किया जाता था। लेकिन आज दान केवल पैसे तक सिमट कर रह गया है।
सनातन धर्म में दान बहुत महत्व है। विद्या, भूमि, कन्या, गौ और अन्न दान इन पांच दानों का बहुत महत्व है।

सामान्यतः दान इश्वर की आराधना का सबसे आसान और उत्तम उपाय माना जाता है।
वेदों के अनुसार धर्म की उन्नति, सत्य एवं विद्या के लिए दिया जाने वाला दान सबसे उत्तम है। इसी प्रकार पुराणों में भी अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को श्रेष्ठ माना गया है।
स्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम्।

नैमिषारण्य स्थित श्री वेदव्यास धाम के प्रमुख कार्यकारी श्री रंजीत शास्त्री जी का कहना है की मोह माया में फंसे व्यक्ति के लिए मोह त्यागने की शुरुआत दान और क्षमा से ही होती है। दानशील व्यक्ति निःस्वार्थ दान से अपना लोक परलोक दोनो संवार लेता है। वे आगे कहते हैं कि श्री वेदव्यास धाम प्रतिवर्ष हजारों निर्धन कन्याओं के विवाह की व्यवस्था करता है। नैमिषारण्य में गऊ दान को बहुत पुण्य का काम समझा जाता है । अतः गौशाला के जरिए यहाँ गौधन का पालन-पोषण एवं रक्षण किया जाता है। किसी भूखे का पेट भरने से बड़ा कोई पुण्य नहीं होता है इसलिए ज़रूरतमंद को अन्नदान जैसे अनेक धर्मार्थ कार्यों का निष्पादन यहाँ किया जाता है।इसके अतिरिक्त वृक्ष दान, प्यासे को पानी , निर्धन बच्चों की शिक्षा आदि अनेक कार्य में श्री वेदव्यास धाम बढ़ चढ़कर भाग लेता है।

दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः।

नैमिषारण्य श्रेत्र में दान करने से व्यक्ति को परम कल्याण की प्राप्ती होती है।

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